गये । इन बातों में यदि सच्चाई है तो हम बिना संकोच कह सकते हैं कि आर्य जाति का इतिहास तथा उसके उपकरण विद्यमान हैं और यदि कोई शोधकर्ता संस्कृत के ग्रन्थों के आधार पर इतिहास के तथ्यों का अन्वेषण करे तो बहुत कुछ जानकारी मिल सकती है।

आर्य जाति की पुरातनकालीन उन्नति के ज्ञान के लिए हमें संस्कृत विद्या का अध्ययन करना होगा। किन्तू प्रश्न होता है कि जब तक संस्कृत ग्रन्थों की सहायता लेकर भारत का इतिहास लिखा जाये तब तक हमें क्या करना है? यह प्रश्न हमें चिन्ताग्रस्त कर देता है। सच्चाई यह है कि आज इस देश के हिन्दू बालकों को जो इतिहास पढ़ाया जाता है वह अविश्वसनीय तथा पक्षपातयुक्त है। आर्य जाति के इतिहास के अध्ययन में अनके कठिनाइयां उत्पन्न की गई हैं। संस्कृत भाषा में अनेक ग्रन्थ नष्ट हो गये है और यही कारण है कि इतिहास के लेखकों के द्वारा भी अनेक भूलें हुई हैं। जब संस्कृत के


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एक बार करवट बदली और अपने भविष्य के निर्माण में तत्पर हो गया। एक अन्य जाति भी है जिसकी गौरव पताका किसी समय सारे संसार में लहराई थी, उस समय जब कि वर्तमान में सभ्य कहलाने वाली जातियों का कहीं अता पता नहीं था। इस जाति के शास्त्र और वाणी, धर्म और दर्शन, शील और चरित्र, वीरता और गम्भीरता सभी कुछ सर्वोच्च थी। इसका साक्षी है कि यह जाति की कीर्ति और सभ्यता का गौरव गान कर रहा है।

इस जाति की भाषा ने संसार की विभिन्न प्रचलित भाषाओं को जन्म दिया है।


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