का प्रमाण देती है। दक्षिण के नितान्त सिरे पर यह दुर्ग एक महान् मण्डल को सुदृढ़ करता है। पश्चिम में एक दर्रे के ऊपर है ( जो कि दक्षिण से कोंकण जाने के लिए उचित रास्ता है) उत्तर में सावित्री नदी तथा कृष्णा के स्त्रोत हैं जो दुर्ग से कुछ ही मिल की दूरी पर महाबलेश्वर के मन्दिर के पास हैं। पश्चिम में कोवरी नदी बहती है और उसके तट इस दुर्ग (किले) की रक्षा करते हैं। पश्चिम की ओर ऊंची नीची ज़मीन का पहाड़ी देश है जो कोंकण तक चला गया है और 60 मील के फासले पर जा समुद्र में मिला है। प्रतापगढ़ दुर्गम पहाड़ों की श्रेणी में है जो उत्तर दिशा में है। किले की इमारत भी बड़ी मजबूत है।

58 छत्रपति शिवाजी

दोहरी पक्की दीवारें उसके चारों तरफ हैं और चार मीनारें (बुर्ज) भी हैं।

उत्तरी किले में शिवाजी की आराध्या देवी का मन्दिर है और ऊपरी भाग में महादेव तथा पार्वती का मन्दिर है। शिवाजी


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फतेहखां ने शांहशाही सेनापति महाबत खां से झगड़ा कर दौलताबाद अर्थात् बीजापुर की राजधानी पर चढ़ाई कर दी। शाहजी भोंसले इसके साथ खूब वीरता से लड़ते रहे परन्तु अन्त में हार गये। बीजापुर वालों ने फतेहखां से सन्धि की बातचीत की जिसमें एक शर्त यह थी कि फतेहखां शाहजी भोंसले को वीरता से युद्व करने के बदले बहुत कुछ पारितोषिक दें। चतुर फतेहखां ने बीजापुर वालों से सन्धि करते ही मुगल सेना पर आग बरसाना आरम्भ कर दिया जिसको देख कर महाबतखां को बहुत क्रोध आया और


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