खां ने उसे मान लिया और अकेले उस स्थान पर आया जहां शिवाजी ने मुलाकात करने को कहा था। जब अफ़ज़ल खां बगलगीर को बढ़ा तो शिवाजी ने जो सुसज्जित था, अपने जातीय शस्त्र (बिछुवे) से उसका पेट फाड़ डाला और तलवार से काम तमाम कर दिया। अफ़ज़ल खां के साथ जो थोडे़ से मनुष्य साथ आकर कुछ दूरी पर छिपे बैठे थे आ पहुंचे और सम्पूर्ण सेना में कोलाहल मच गया।
जो जो कटुशब्द यथा काफिर, चूहा आदि मुसलमान
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लेखकों ने लिख मारा है और जो जो किंवदन्तियां शिवाजी की लल्लो चप्पों तथा चालों की लिखी हैं वे स्वयं इस बात की गवाही देती हैं कि मुसलमान निरिक्षकों की सम्मति पक्षपात शून्य नहीं है। सन्देह की अवस्था में प्रत्येक लेखक ने अपनी ही कल्पना से काम लेकर कोरी कल्पना द्वारा झूठे झूठे चित्र खींचे हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि (अंगे्रज लेखक स्टाक साहब ने लिखा है) हिन्दुओं के विषय
देकर स्त्री को छुड़ा कर गोदवाना के किले में पहंुचा दिया। एक नई चाल शाहजी भोंसले ने इसी बीच और चली। फतेहखां वजीर (अहमदनगर का) उस समय गिरफ्तार ही था। फतेहखां ने जिस बादशाह को तख़्त
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पर बैठाया था उसे मुगल सेना ने पकड़ कर ग्वालियर के किले में कैद कर दिया। शाहजी भोंसले ने तुरन्त अहमदनगर के शाही खानदान के एक कम अवस्था वाले बालक को सिंहासन पर बिठा दिया और आप उसका प्रबन्धकर्ता बन बैठा। बीजापुर के राज्य में इस समय दो