यह भी कहला भेजा कि यदि शिवाजी आधीनता स्वीकार कर लेगा तो उसके लिए बहुत उत्तम होगा। उधर शिवाजी को भी दूत ने यह सब समाचार दिया कि अफ़ज़ल खां की भावना दुष्ट है और उसकी इच्छा है कि किसी तरीके से शिवाजी को फंसाया जाय। अफ़ज़ल खां के दूत (उसी ब्राह्यण) को जब धर्म की सौगन्ध दी गई तो उसने सम्पूर्ण वृत्तान्त सत्य सत्य बखान कर दिया। शिवाजी ने
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सेचा कि भाग्य परीक्षा अवश्य करनी चाहिए। अतएव मिलने की स्वीकृति दे दी। फलस्वरूप मिलने के लिए स्थान नियत किया गया। शिवाजी पूर्ण रूप से सुसज्जित हो कर रवाना हुए और अपने पूरोहित ब्राह्यणों को काशी तथा गया आादि स्थानों में पिण्ड देने के निमित्त भेज दिया और स्वयं पूजा भक्ति करके शस्त्र बांधा और भीतर ’सज्जो’ पहिना। उसके ऊपर साधारण सादा ’अंगरखा’ पहिना। इसका अभिप्राय यह था कि शिवाजी हर प्रकार से मरने के लिए उद्यत
शायस्ता खां और ख़ानदौरां नियत किये गये परन्तु वे शाहजी भोंसले के सम्मुख न ठहर सके। अन्त में शाहजहां ने शायस्ता खां और अलीवर्दी खां को उनकी सहायता के लिए भेजां इन चारों ने मिलकर फिर शाहजी भोंसले से लड़ाई छेड़ दी। पूरे दो वर्ष लड़ाई होती रही परन्तु शाहजी इनके हाथ न आये। लाचार होकर शाहजहां ने बीजापुर के बादशाह के साथ सन्धि करने का प्रस्ताव किया अन्त में शाहजी भोंसले ने मुकाबला छोड़ दिया।
शाहजी भोंसले उस समय अपनी वीरता और चतुराई के कारण पूर्ण से प्रसिद्व हो