दुःख होता है। ईश्वर ने उसमें बदला लेने की शक्ति कूट-कूट कर भर दी है तो फिर हम किस प्रकार से यह निश्चय कर लें कि अफ़ज़ल खां एक साधारण मनुष्य था । जो इन घटनाओं के होते हूए भी बिना किसी प्रकार की दुष्ट भावना के अकेले ही एक प्रसिद्व नरशेर की कन्दरा में जा घुसा। यदि हम विचारार्थ यह भी मान लें कि ऐसी घटना हुई और शिवाजी ने धोखे से अफ़ज़ल खा को कत्ल किया तो भी कुछ आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि उस समय में शत्रु को इस प्रकार से मार लेना बुरा नहीं माना जाता था। औरंगजेब ने इसी प्रकार के व्यवहारों से दिल्ली के राज्यसिंहासन पर अधिकार जमाया था। इस घटना से कुछ दिन पूर्व बीजापुर का राज्यमन्त्री ’आजम खां’ भी इसी प्रकार मारा गया था और उसका पुत्र ’खवास खां’ भी पीछे से इसी प्रकार से मरा। स्वयं औरंगजेब ने इसी भाव से शिवाजी को दिल्ली में बन्दी किया था। भावार्थ यह कि भारत का
छः वर्ष का बालक मुसलमान आक्रमणकारियों के हाथ से बचता और भागता फिरता है। जब उसी अवस्था में आजकल के बच्चे गलियों और बाजारों में खेलते फिरतें हैं। माताएं इस बात की चिन्ता भी नहीं करती कि उनका बालक कहां खेल रहा है? शिवाजी की माता अपने बच्चे को छिपाती थी और बड़ी सावधानी से उसको ऐसे स्थान पर रखती थी जहां से वह दुश्मनों के हाथ से बचा रहे। सन् 1636 ई. तक शिवाजी को अपने पिता का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ था। अन्त में धीरे धीरे शिवाजी के पिता माता में पुनः प्रेम