इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। मुसलमानों ने युद्वशासन के अनुसार इस प्रकार शत्रु को मारना पाप नहीं समझा। जैसा वर्तमान समय में समझा जाता है। राजपूतों का युद्वशासन तो अपनी पवित्रता, पुरूषार्थता और वीरता में सब जातियों से उच्च है। धोखा तथा दगा तो क्या! राजपूतों ने घिरे हुए शत्रु को मारना भी वीरता से बाहर समझाा अन्यथा उन्हें कई बार अवसर मिल चुके थे कि वे भारतवर्ष से यवनराज्य का नामोनिशान मिटा देते।
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अफ़ज़ल खां के मरते ही सम्पूर्ण सेना में खलबली मच गई और मराठों ने शत्रु रक्त में हाथ रंगने शुरू कर दिये। सम्पूर्ण इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि शिवाजी इस प्रकार के कर्म से सदा अप्रसन्नता प्रकट करता था और आज्ञाएं निकाल रक्खी थी कि यथासम्भव किसी के साथ अनावश्यक युद्व न छेड़ा जाये। शिवाजी कैदियों के साथ सदैव अत्यन्त क ृपा तथा दया का बर्ताव करता
हो गया। शाहजी ने शिवा की शादी कर दी और कुछ दिन बाद फिर कर्नाटक की लड़ाई को रवाना हुए। शिवाजी माता के साथ पूना में विश्राम लेते रहे।
शिवाजी के बाल्यकाल की एक कहानी इस प्रकार प्रसिद्व है जिससे उनके आगामी पवित्र जीवन का वृत्तान्त
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भली प्रकार मालूम होता है। कहते हैं कि जब शाहजी भोंसले बीजापुर दरबार में थे तब एक दिन ’मुरार पन्त’ ने शिवाजी से कहा ’’ चलो आज तुमको दरबार में ले चलें और बादशाह को सलाम करायें।’’ होनहार बालक