था। इस अवसर पर जितने शत्रु के सैनिक कैद कर लिऐ गये उनके साथ भी शिवाजी अत्यन्त अनुग्रह और दया से पेश आता था। बहुत से लोगों ने इसी अनुग्रह के कारण इसकी नौकरी स्वीकार की थी। ’भूभराय घाटमी’ एक बड़ा मान्य मरहठा था जो किसी समय शिवाजी के पिता शाहजी का परम मित्र था शिवाजी उसे इस बात पर उद्यत न कर सका कि वह बीजापुर की पौकरी छोड़ कर शिवाजी की नौकरी करे फिर भी शिवाजी ने उसको बहुत सा पुरस्कार देकर विदा किया था। अपनी सेना के चोट खाये हुए वीरों को उन्होंने बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं ( सोने के हार तथा चांदी की जंजीरें ) उपहार में दी थीं साधारण रीति से वह अपनी सेना को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता था जिससे उनका उत्साह दिन प्रतिदिन द्विगुणित होता रहता था अफ़ज़ल खां की तलवार अब तक शिवाजी के वंशधरों (जो कोल्हापुर में राज करते हैं) के पास है। इस घटना
ने इसमें प्रसन्नता के बदले घृणा प्रकट की और कहा कि हम हिन्दू हैं और बादशाह यवन है, महायवन है, महानीच है। हम गौ और ब्रह्यण के सेवक हैं और वह उनका शत्रु है। हमार और उसका मेल नहीं हो सकता। मैं ऐसे मनुष्य से सलाम करना नहीं चाहता जो हमारे धर्म का शत्रु है। उसे तो मैं छूना भी नहीं चाहता। मैं ऐसे मनुष्य को कभी बादशाह नहीं मान सकता और न कभी उसका अदब कर सकता हूं। सलाम तो एक तरफ रहा, मेरे मन में यह बात आती है कि उसका गला काट डालूं।