लेखकों के द्वारा भी भूलों का होना सम्भव है तो उन लोगों का तो कहना ही क्या, जो इस भाषा को अशिक्षित लोगों की भाषा मानते हैं तथा जिनकी धारणा है कि आर्य जाति ने उन्नति के पथ पर चलना कभी सीखा ही नहीं था।

हिन्दू जाति की उन्नति के बारे में पश्चिम के विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है किन्तू मुसलमान लेखकों का इस ओर

10 छत्रपति शिवाजी

ध्यान कम गया है। पाश्चात्य विद्वानों के भी दो प्रकार के लेख मिलते हैं। प्रथम कोटि में वे लोग हैं जिन्होंने पक्षपातरहित होकर लिखा है, यद्यपि इनकी संख्या कम है। इन लोगों में भी वे लोग और भी कम हैं जो हमारी जाति के प्रति सहानुभूति रखकर लिख सके हैं। खेद इस बात का है कि इस कोटि के ग्रन्थों तक हमारे विद्यार्थियों की पहुंच बहुत कम है। आज जो इतिहास पढ़ाये जाते हैं वे इतने विचित्र हैं कि उनके सिर, पैर का कुछ पता नहीं लगता। जिन स्वदेशी विद्वानों ने हमारे देश


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इसके शिल्प और ज्ञान को अन्यों ने सीखां इस जाति के आविर्भाव के पश्चात् न जाने कितनी जातियां इस पृथ्वी पर जन्मीं और नष्ट हुई किन्तू समय के घात प्रतिघात को सहते हुए आज भी यह जाति जीवित है, यद्यपि जराजीर्ण अवश्य हो गई है।

8 छत्रपति शिवाजी

अनेक लोग हमारी उक्त धारणा से सहमत नहीं हैं किन्तू उन्हें यह जान लेना चाहिए कि हमारे उक्त कथन को अनेक पाश्चाात्य विद्वानों ने अपनी खोज और शोध के द्वारा सत्य पाया है। यह स्वीकार किया जा चुका है कि संस्कृत भाषा वर्तमान में प्रचलित इण्डो-आर्यन


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