को आज्ञा मिली कि सेना लेकर आगे बढ़े और अफ़ज़ल खां का पुत्र ’फाज़िलखां’ जो अपने पिता का बदला शिवाजी से चुकाना चाहता था उसके सााि हो लिया (दोनों को आज्ञा मिली कि ’पलाना’ किला) (जो अभी थोड़े दिन पहले शिवाजी ने प्राप्त किया था) उस पर आक्रमण करें। देसरी तरफ से फतेहखां को आज्ञा दी गई । ’सीदी जौहर’ को सलावतखां की पदवी दी गई। शिवाजी ने भी युद्व की तैयारी आरम्भ कर दी और ’रघुननाथपन्त’ को आज्ञा दी कि फतेहखां का सामना करे तथा ’आबाजी सोनदेव’ कल्याण भभेरी के किले पर तैनात किये गये। ’भाऊजी पालकर’ को आज्ञा मिली िकवे बारी के सामन्त लोगों का सामना करे। पूर्णधर, संगर व प्रतापगढ़ और आस पास के इलाके की रक्षा के लिए ’मोरोपन्त’ को रखा गया और स्वयं शिवाजी ’पलाना किले’ की रक्षा में कटिबद्व हो गये। शिवाजी ने बीजापुर की सेना को आगे बढ़ने से नहीं रोका परन्तु जब सेना दुर्ग
का नियम नहीं जानता। शिवाजी जब दरबार से घर वापस आया तो उसने स्नान किया और नवीन वस्त्र बदले।
शाहजी को अपने नौकरों में सिर्फ दो नौकरों पर पूरा विश्वास था। उनमें से एक का नाम दादा जी कोंड़देव था। दादाजी कोंडदेव के अधीन पूना का प्रबन्ध था जहां पर शिवाजी तथा उनकी माता रहा करती थी। दादाजी कोंड़देव एक बड़ा बुद्विमान और चतुर आदमी था। इसी ने शिवाजी को उत्तमोत्तम शिक्षा दी थी। जो उसका कत्र्तव्य था उस सब को उसने बड़ी बुद्विमानी से पूर्ण किया। जागीर का प्रबन्ध इस