के पास आ डटी तो ’नेता जी पालकर’ ने आसपास की बस्ती उजाड़ना शुरू कर दिया और यत्न किया कि जिससे शत्रु को भोजन सामग्री मिलनी कठिन हो जाये। मावली लोगों ने पर्वतों को घाटियों को छोड़ कर अलग बस्ती बसाई और यदा कदा शत्रु पर आक्रमण कर उनका विध्वंस करने लगे! यद्यपि शिवाजी के साथियों ने इस प्रकार शत्रु को अधिक हानि पहंुचाई परन्तु तब भी ’सीदी जौहर’ धैर्य से मैदान में डटा रहा। उधर कोंकण में भी युद्व आरम्भ हो गया जिससे
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मुसलमानों ने कुछ समय तक लाभ उठाया। ’बाजीराव पालकर’ भी ’बारी’ के अध्यक्ष को अपने आधीन न कर सका। इस पिछली लड़ाई में दोनों ओर के अध्यक्ष मारे गये परन्तु सेना ने हार न मानी।
हा शोक! कितने योद्वा और वीर अपने भाइयों के हाथों मोर गये। ऐसा कोई नहीं था जो समझता कि अपने भाइयों का विध्वंस करना (भाई भी कैसे जो धर्म
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उत्तमता से किया कि खेती में खूब उन्नति होने लगी और इलाके की समस्त पहाड़ी आबादी को, जिसको मावली के नाम से पुकारा जाता था अपना सेवक बना लिया। प्रजा बहादुर और योद्वा किन्तु निर्धन थी। उसने कई वर्ष तक इन लोगों से मालगुजारी नहीं ली। प्रजा के बहुत से आदमियों को अपने यहां नौकर रखा और उनके पालन पोषण का प्रबन्ध किया। दादाजी कोंड़देव की यह दूरदर्शिता शिवाजी के काम आई। जहां उसने जागीर का प्रबन्ध उत्तम किया था वहां शिवाजी की शिक्षा की भी पूरा