युद्व करने तथा निर्दयी शत्रुओं के हाथों से अपनी भूमि छुड़ाना चाहते थे) महापाप है। दुर्भाग्य ! भारतवर्ष के इसी भीतरी संग्राम ने ’तरावड़ी’ के मैदान में भारतवर्ष से हिन्दू राज्यों की समाप्ति कर दी। इसी भीतरी संग्राम ने पीछे कई आक्रमणकारी मुसलमानों को भारत को लूटने का अवसर दिया। इसी भीतरी संग्राम ने हिन्दुओं को जातीय अवस्था से अलग कर दिया। इसी भीतरी संग्राम ने मरहठों की अवनति की। इसी ने शिवाजी के हाथ से लगाये हुए पौधों को समूल नष्ट कर दिया। इसी पारस्परिक संग्राम ने सिखों का नाश किया तथा अब भी यही परस्पर का संग्राम हिन्दुओं की उन्नति तथा पारस्परिक प्रेम में बाधक है। बहुत अच्छा होता यदि कोई दैवी आकाश वाणी होती और इन लोगों को पारस्परिक युद्व की हानियां समझा कर रोकती।
शिवाजी को जब समाचार मिला तो उसने समझा कि मैंने बड़ी भारी भूल की जो इस प्रकार किले में घिर कर बैठ गया।
ध्यान रखा था। इस समय मरहठों में पढ़ने लिखने की इतनी चर्चा नहीं थी बल्कि युद्व-विद्या को ही प्रधान कत्र्तव्य समझाा जाता था। शिवाजी बाल्यकाल में घोड़े की सवारी में अद्वितीय तथा शस्त्रविद्या में अनुपम हो गये थे। लक्ष्य लगाने, भाला चलाने और तलवारों के प्रयोग करने में भी सब जगह प्रसिद्व हो गये थे। उन समस्त गुप्त रीतियों और हथकण्डों को भी दादा जी कोंड़देव की कृपा से जान लिया जो उन जैसे वीरों के लिए आवश्यक था। रामायण और महाभारत की कथा में उनको बड़ी भक्ति थी। यह भक्ति और प्रेम