घेरे को चार महीने हो गये यद्यपिइ इस समय तक शत्रु को आक्रमण करने का कोई अवसर नहीं मिला तथापि शत्रु तब भी डटा रहा और सचेत रहा। अन्त को शिवाजी ने एक नई चाल अर्थात् सन्धि के लिए बातचीत चलाई। दोनों ओर से लड़ाई बन्द कर दी गई। अभी पूर्ण रूप से मिलाप होने न पाया था और सम्पूर्ण नियम भी निश्चित नहीं हुए थे कि रात को शिवाजी ने कुछ साथी लेकर किले से निकल कर पर्वतों से होते हुए जंगलों का रास्ता लिया। शिवाजी पूर्ण उत्तेजना से
छत्रपति शिवाजी 65
’अगना’ की ओर प्रस्थान कर रहे थे पर विरोधियों को यह हाल मालूम हो गया कि शिवाजी किले से निकल भागे। तत्काल ही फ़ाजिल मुहम्मद खां और सीदीजौहर का पुत्र सैदी अजीज पीछा करने के लिए रवाना किये गये। परन्तु शिवाजी ने इसके पहले पूरा प्रबन्ध कर दिया था। अर्थात् इस आपत्ति को हटाने के लिए अपने ’मावली’ साथियों का एक
यहां तक बढ़ गये थे कि बड़ी अवस्था होने पर अपने प्राणों को संकट में डाल कर भी जहां कथा होती थी वहां पहुंच जाते थे। थोड़ी ही अवस्था में मुसलमानों के अत्याचार को देखकर उनसे उन्हें इतनी घृणा हो गई थी जो समस्त जीवन उनके हृदय में बनी रही। शिवाजी को अपनी युवावस्था में मावलियों से मिलने का अवसर बहुत मिला। उनसे मिलकर उनके गुणों को अच्छी प्रकार पहिचान लिया और आरम्भ ही से ऐसी मित्रता की कि अन्त तक वे सब शिवाजी के सहायक बने रहे।
जागीर के प्रबन्ध में भी दादाजी