समूह मार्ग में छोड़ दिया था जिसका प्रबन्ध बाजीराव देशपाण्डे के आधीन था। जब पीछा करने वाले मुसलमान आ पहंुचे तो उनके साथ सेना बहुत अधिक थी तथा मरहठे संख्या में बहुत कम थे। शिवाजी ने आज्ञा दी थी कि जब तक (हमारी ओर से) पांच गोलियां न चलें तब तक लड़ते रहना और अमुक दिशा में लगातार पांच गोलियां चल जाये तो समझ लेना कि हम सुख से किले से पहंुच गये। देशपाण्डे और वे मावली अत्यन्त वीरता से लड़ते रहे, आधे के लगभग मारे गये परन्तू फिर भी शत्रु को रास्ता नहीं दिया। यहां तक कि देशपाण्डे भी लड़ते लड़ते मारे गये। यह अभी जमीन पर गिरे भी न थे कि गोलियों का शब्द सुनाई दिया। देशपाण्डे ने समझा कि शिवाजी सकुशल किले में पहंुच गये इस प्रकार खुशी से उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। अन्य साथियों ने देशपाण्डे की लाश को उठाकर अगणित शत्रुओं को हताश छोड़ कर अपना रास्ता लिया। इस
कोंड़देव ने शिवाजी को पूर्ण शिक्षित किया था जिसके कारण वे सर्वप्रिय हो रहे थे। शिवाजी के हृदय में स्वतन्त्रता की अभिलाषा पहले ही से थी जो अपना रंग दिखाने लगी। कभी कभी शिवाजी दिन भर गायब रहते थे और ऐसे लोगों से मिलते जुलते रहते थे जो
छत्रपति शिवाजी 41
किसी राज्य के अधीन नहीं थे और न किसी कानून के पाबन्द थे। रात दिन जंगलों में घूमते फिरते। यहां तक कि कुछ लोग यह ख्याल करने लगे कि शिवाजी डाकुओं के साथ मिल गये। ये सब शिकायतें दादाजी कोंड़देव के पास