राजधानी ’सुरंगापुर’ पर अधिकार जमा लिया। ’दलवी’ की हिन्दू प्रजा ने शिवाजी की इस करतूत को पसन्द न किया और राज्य छोड़ कर जाने लगे। शिवाजी ने एक प्रसिद्व और उच्चवंशीय ’सरदवे’ नाम के सरदार को समझा बुझा कर वापस बुलाया जिसके साथ बहुत सी हिन्दू प्रजा भी लौट आई। उसी वर्ष वर्षा ऋतु में उन्हांेने प्रतापगढ़ में एक मन्दिर बनवाया और रामदास जी स्वामी को अपना गुरू मानकर पूजन का भार सौंप दिया। उसका पूजन ऐसा न था जो उसकी संग्राम की कार्यवाहियों अथवा देशप्राप्ति में सहायक होता। वर्षा भर फतेह खां के पीछे लगे रहने पर कई एक गांवों पर उन्होंने विजय प्राप्त की। अब बीजापुर का थोड़ा सा हाल सुनिये। बादशाह एक और सन्देह में पड़ा।
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ऊपर लिखा जा चुका है कि राजा को सीदीजौहर पर रिश्वत लेने का सन्देह हो गया था। अतएव दोनों में मनमुटाव हो जाने के कारण
प्रसन्न कर लिया कि वह तोरण किला उनको शिवाजी दे देवे। शिवाजी के जीवन का सबसे प्रथम कार्य जो बिना युद्व किये ही समाप्त हुआ, वह तोरण के दुर्ग को प्राप्त करना था जो सन् 1636 ई. में पूर्ण हुआ। उस समय जब शिवाजी की अवस्था केवल 19 वर्ष की थी। किला प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने अपना एक वकील बीजापुर भेजा ताकि वह जाकर बादशाह पर यह प्रकट करे कि शिवाजी ने यह काम सिर्फ बादशाही सेवा को सम्मुख रख कर ही किया है। इसने वकीलों द्वारा यह सन्देश
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