अन्त में बादशाह स्वयं रणक्षेत्र में उतरा तो ’सीदीजौहर’ ने क्षमा मांगी। यद्यपित ब भी ’सीदीजौहर’ के दिल में ऐसा भय समाया हुआ था कि बादशाह के सामने आने की हिम्मत न पड़ी और वन्दन शिष्टाचार करके चला गया। जब बादशाह कृष्णा नदी के तट पर ठहरा हुआ था तो उसने सन्देश भेज कर सीदीजौहर को बुलाया। यद्यपि ’सीदीजौहर’ आया और वन्दन शिष्टाचार करके चला गया परन्तु इब्राहिम खां को जो बादशाह का मन्त्री था (और शीदीजौहर का कट्टर शत्रु था) खटका ही लगा रहा।
इसी समय कर्णाटक में गड़बड़ हो गई और कुछ विद्रोही तैयार हो गये। बादशाह स्वयं शिवाजी के पीछे जाना चाहता था परन्तु जब सीदीजौहर की ओर से उन विद्रोहियों को दबाने की रूचि न पाई गई तो बादशाह को ’सीदी’ पर सन्देह हुआ कि यह भीतर ही भीतर शिवाजी से मिल गया है। तब भी बादशाह मन्त्रियों से सलाह लेकर शिवाजी पर चढ़ाई करने
भिजवाया कि ऐसे में शिवाजी जैसे वीर का रहना ही अधिक लाभप्रद होगा। इसके साथ ही पहले के जागीरदारों की अपेक्षा इसने दुगना कर देना भी स्वीकार किया। उधर शिवाजी के वकील इस निवेदन को प्रकट करने के ढंग निकाल रहे थे इधर शिवाजी अपने किले को सुदृढ़ बनाने और सेना बढ़ाने में लगे हुए थे। दरबार वालों ने इस निवेदन के उत्तर में जान बूझ कर देरी की, परन्तू यह विलम्ब शिवाजी ने शस्त्र खरीद हुए एक खजाना हाथ लग गया जिससे शिवाजी ने शस्त्र खरीद कर एक और नया