का इतिहास लिखा उन्होंने भी स्वंय का अनुसंधान न करके पाश्चात्य विद्वानों का ही अनुसरण किया है। यही कारण है कि हमारा इतिहास अभी तक अधूरा है। हिन्दू सन्तान और हिन्दू विद्यार्थियों का यह कत्र्तव्य है कि वे इस कमी को पूरा करें। जब तक यह कार्य नहीं हो जाता तब तक उपलब्ध अनुसंधान के आधार पर ही ऐसा इतिहास लिखा जाना चाहिए जो पक्षपात शून्य हो और योग्य लेखकों के कठिन परिश्रम का सार हो, जिसे पढ़कर हमारे बच्चें इस बात को जान सकें कि हमारे पूर्वज सभ्यता के किस उच्च शिखर तक पहुंच थे और जहां से वे अधोगति के गर्त में भी गिरे।
उन्नति के इतिहास के अध्ययन के साथ साथ अवनति के इतिहास अत्यन्त शोचनीय रहा है। इस इतिहास को मुसलमानों ने लिखा जिसमें उन लेखकों का पक्षपात स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसमें लेखकों को दोष देना भी उचित नहीं है क्योंकि ये लेखक मुसलमानी दरबारों में रहते थे।
परिवार की भाषाओं की जननी है। इस परिवार में यूरोप की प्रायः अधिकांश भाषाओं के अलावा जें़द पुरानी फारसी तथा पश्तों आदि भाषांए भी सम्मिलित हैं। यह सम्भव है कि अन्य भाषाओं का मूल भी इसी संस्कृत भाषा को मान लिया जाये।
कालक्रम से भारत में अनेक मतों का प्रचलन हुआ। जिस बौद्व धर्म के अनुयायियों की संख्या इस विश्व में बहुत अधिक है, उसका जन्म भी भारत में हुआ और इसके मन्तव्यों पर वैदिक धर्म का प्रभाव प्रत्यक्षयता दिखाई पड़ता है। पारसी मत के प्रवत्र्तक महात्मा ज़र्दुश्त की मान्यताएं