के बजाय कर्णाटक पर अधिकार करने के लिए आगे बढ़ा। ’बहलाले खां’ और बाजीघोरपड़े किसी काम से अपनी जागीर में गये हुए थे। बाजीघोरपड़े ने शिवाजी के पिता को छल करके कैद किया था और बीजापुर भेज दिया था। शिवाजी सदैव इसी चिन्ता में रहा करते कि किसी तरह से ’बाजी’ से बदला लें। अवसर अच्छा पाकर शिवाजी ने तुरन्त ’बाजी’ पर चढ़ाई कर दी और सम्बन्धियों सहित उसे हनन कर डाला तथा ’मौधल’ को लूट कर तुरन्त विशालगढ़ वापस आ गये। राजदरबार की ओर से ’खवासखां’ शिवाजी को दबाने के लिए नियत किया गया परन्तु थोड़ी देर बाद सम्पूर्ण सेना (जो शिवाजी का सामना करने के लिए नियत की गई थी) वापस बुला ली गई और बीजापुर के बादशाह ने शिवाजी के पिता से
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मेल कर लिया। इसी बीच ’बाजीघोरपड़े’ का देहान्त हो गया।
’बाजीघोरपड़े’ की मृत्यु का समाचार जिस
किला बनाने की नींव डाली। तोरण किले से तीन मील की दूरी पर ’महोविदा’ की पहाड़ी पर उसने एक और किला तैयार कर लिया जिसका नाम राजगढ़ रखा। यह किला सदा शिवाजी के ही अधीन रहा।
जब इस समस्त कार्यवाही का समाचार बीजापर पहंुचा तब उन्होंने शिवाजी के पास इस अभिप्राय का एक परवाना लिख भेजा जिससे कि अपनी इन चालबाजियों से हाथ खींच ले और साथ ही शाहजी के पास भी पत्र लिख भेजा कि वह अपने पुत्र शिवाजी को समझा देवे। पत्रोत्तर में शाहजी ने बादशाह बीजापुर को