समय शाहजी (शिवाजी के पिता) ने सुना तो अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसी अवसर पर अपने पुत्र शिवाजी से मिलने के निमित्त कर्णाटक से इधर आये। शिवाजी ने जिस समय समाचार सुना तो अपनी श्रद्वा और पितृभक्ति के अनुसार कुछ मीलों आगे चल कर अपने पिता की अगवानी की और घोड़े से उतर कर आदर पूर्वक वन्दना की।
इस समय शिवाजी के पास पचास हजार पैदल सेना और सात हजार घुड़सवार सेना थी। चारों तरफ उनकी धाक जमी हुई थी। बीजापुर का राज्य और मुगलिया शासन चक्र तथा पश्चिम का इलाका कम्पायमान हो रहे थे। शिवाजी ने केवल थल संग्राम ही में नहीं अपितू सामुद्रिक संग्राम में भी नाम पैदा कर लिया था। सामुद्रिक संग्राम के लिए उन्होंने एक बहुत बड़ा ’बेड़ा’ बनवाया था और ’कुलावा’ को अपना बन्दरगाह नियत करेक जलमार्ग से भी शत्रु को सताना आरम्भ कर दिया। पुर्तगाल वालों ने तो शिवाजी का लोहा मान
पत्र लिख दिया कि मेरे बेटे ने बिना मेरी सम्मति लिये यह काम किया है। मैं और मेरे सम्बन्धी दरबार के शुभचिन्तक हैं अतएव बहुत सम्भव है कि शिवाजी ने जो कुछ किया है वह जागीर की उन्नति और रक्षा ही के निमित्त किया हो।
इधर शाहजी ने दादाजी कोंड़देव के पास पत्र लिखकर अप्रसन्नता प्रकट की और कहला भेजा कि वे भविष्य में शिवाजी को ऐसा कार्य करने से रोकें। इस समाचार के सुनते ही शिवाजी को बड़ी चिन्ता हुई। एक ओर थी पिता की आज्ञा और दूसरी ओर थी धर्म और राज्य प्राप्त करने