कर मित्रता कर ली थी। इसी बीच बीजापुर के बादशाह से भी सन्धि हो गई। अब शिवाजी ने मुगलिया राज्य की ओर दृष्टि फेरी।
अध्याय 6
मुगलवंश का सामना
शिवाजी ने बीजापुर के बादशाह से छुट्टी पाकर मुगल राज्य से सामना करने का विचार किया। एक पुष्कल सेना एकत्र करके दो भाग किये। पैदल सेना का अध्यक्ष तो ’मोरपन्त’ को बनाया और घुड़सवार सेना की बागडोर ’नेताजी पालकर’ के हाथ में थमा दी और आज्ञा दी कि मुगलिया मण्डल को नष्ट भ्रष्ट करके अपना राज्य निष्कण्टक बनाने के लिए कार्य आरम्भ कर दो। फलस्वरूप् ’नेताजी’ औरंगाबाद तक लूट खसोट करके लौट आये और पूना में विश्राम किया। जब यह सब समाचार औरंगजेब को मिला तो क्रोधित होकर ’शायस्ता खां’ मुखिया को आज्ञा दी कि तत्काल एक महती फौज लेकर इस उजड्ड तथा धूर्त मरहठे की दुर्गति कर दे और उसके सम्पूर्ण मण्डल को ध्वस्त करके राज्य अपने
की प्रबल इच्छा। उस समय शिवाजी के हृदय में तरह तरह के विचार उठ रहे थे अद्भूत दशा में उसका चित्त गोते लगा रहा था।
छत्रपति शिवाजी 43
अन्त में उसने अपनी प्यारी स्त्री से सम्मति ली। स्त्री ने सनातन रीत्यनुसार पहले तो यह कहा कि स्त्रियों की सम्मति ठीक नहीं होती कारण कि उनमें बुद्वि कम होती है। परन्तू यदि आप मेरी सम्मति लेना ठीक समझते हैं तब तो गौ- ब्राह्यण तथा धर्म रक्षा करना अधिक श्रेयस्कर है, चाहे इनके करने में पिता की आज्ञा का उल्लघंन ही क्यों न करना पड़े।