अधिकार में कर ले और शिवाजी को कैद कर लाये। शायस्ता खां इस आज्ञा का पालन करने के लिए एक बड़ी भारी सेना के साथ रवाना हुआ और रास्ते में किलों को फतह करता हुआ पूना तक आ पहुंचा और यहां से ’चाकन’ के किले पर आक्रमण कर दिया। ’फिरंगा निर्मला’ जो ’चाकन’ के किले का अध्यक्ष था अपने साथियों के साथ बड़ी वीरता से लड़़ता रहा। सम्पूर्ण सेना को लिऐ हुए शायस्ता खां 55 दिन तक किला घेरे अड़ा रहा। अन्त को 56 वें दिन जब किले की दीवार गोलियों के काण जर्जर और चलनी हो गई तो वीर मरहठे प्राणों की माया को छोड़ कर मुगलिया सेना पर टूट पड़े और दिन भर युद्व करते रहे। सूर्यास्त तक उन्होंने मुगल सेना को एक पांव भी आगे नहीं बढ़ने दिया। अन्त में सूर्यास्त के समय लड़ाई बन्द
70 छत्रपति शिवाजी
हो गई। प्रातःकाल मराठे दुर्गाध्यक्ष ने इतनी बड़ी सेना से सामना करना निष्फल जाकर किले
स्त्री ने यह भी कहा कि शाहजी यहां से दूर हैं, उनको क्या मालूम किइस इलाके में कौन कौन सी विपत्ति पड़ रही है। यदि वे यहां होते तो कभी ऐसा न करते वरना आपको और अधिक सहायता देते।
शिवाजी की इच्छा तो प्रबल थी ही, साथ ही स्त्री की सम्मति ने अग्नि में घी की आहुति दे दी। फिर क्या था? शिवाजी के विचार और भी दृढ़ हो गये। यद्यपि दादाजी ने भी आदेशानुसार उसे समझाया था क्योंकि दादाजी शिवाजी के रक्षक थे। तब भी कभी कभी दादाजी शिवाजी को ऐसे उत्तर दे दिया करते थे जिससे वह