को खाली कर दिया। मुगल सेनापति ने उन सब की बड़ी प्रशंसा की और दुर्गाध्यक्ष से बड़ी नम्रता के साथ मिला यहां तक की उनको सम्राट् की सेना में एक उच्च पद पर अधिकारी बनाया परन्तु वीर ’निर्मला’ ने यह पद स्वीकार न किया। यद्यपि औरंगजेब समझता था कि मरहठों को अपने अधीन करना कुछ बड़ी बात नहीं है परन्तु शायस्ता खां को इस लड़ाई से पता लग गया कि मरहठा लोगों को अधीन करना कुछ खेल नहीं है। अतएव वह लड़ाई से बचाव करने लगा। उधर औरंगजेब की तरफ से जोधपुर के महाराजा यशवन्तसिंह अपनी सेना के साथ तुरन्त शायस्ता खां की सहायता के लिए रवाना हुए। शाही सेना अपने वीर अध्यक्षों सहित कुछ काल तक चुपचाप पूना के सापने पड़ी रही परन्तु इतनी बड़ी सेना से भयभीत न होकर शिवाजी के दिलजले अफसर शत्रु की सेना तथा उसके मण्डल को नीचा दिखाने से पीछे नहीं हटते थें ’नेताजी पालकर’


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सदैव प्रसन्न रहे। शिवाजी के हृदय में धर्मरक्षा की ज्वलन्त अग्नि धधक रही थी। दादाजी भी समझ गये कि शिवाजी के विचार अटल हैं। अतएव चुप रह जाने के अतिरिक्त दादाजी ने और कोई कार्यवाही नहीं की। कुछ दिनों के उपरान्त दादा कोंड़देव का स्वर्गवास हो गया।

मरने के कुछ दिन पहले दादाजी ने शिवाजी को अपने पास बुलाया और बजाय इसके कि वह शिवाजी को अपने काम से रोकते यह उपदेश दिया- बेटा! धीरता से स्वतंत्र होने की चेष्टा करना। धर्म, गो-ब्राह्यण और प्रजा की रक्षा करना। हिन्दुओं


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