भी अहमद नगर और औरंगाबाद के सामने आ डटा। उन्होंने शत्रु के मण्डल को लूटना तथा फूंकना आरम्भ किया जिससे मुगल सेना अत्यन्त क्षुब्ध हो उठी और एक समूह उन्हें दण्ड देने के लिए रवाना हुआ जिसका सामना करता हुआ ’नेताजी’ जख्मी हुआ पर हाथ न आया।

इसी बीच शायस्ता खां पूजा में आ गया और उस मकान में रहने लगा जो कि ’दादाजी कोंडदेव’ ने बनवाया था। वीर शायस्ता खां ने यह भी विचार न किया कि शिवाजी उन महावीरों में से है जिसके सामने अनादर और गुस्ताखी से पेश आना अन्त में अच्छा फल नहीं लाया करता । यद्यपि शायस्ता खां ने बड़ी सावधानी से प्रबन्ध किया था कि शिवाजी किसी प्रकार भी नगर के भीतर घुसने न पावें परन्तु अन्त में यह बात सिद्व हो गई कि उसकी सभी तदबीरें, बुद्विमानी और विचारशीलता शिवाजी के सामने निष्फल हुई।

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औरंगजेब के सिपहसालार शायस्ता खां ने आज्ञा


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के मन्दिरों को नष्ट भ्रष्ट होने से बचाना और अपना नाम जगत् में फैलाना। वृद्व शिक्षक के इस उपदेश ने वीर शिवाजी के हृदय में नवीन उत्साह का संचार कर दिया। बस फिर क्या था, खुलेआम कार्य आरम्भ कर दिया गया। जिसका अधिक भय था उसने भी मरते मरते शिवाजी को कर्तव्य पूरा

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करने की आज्ञा दे दी। दादाजी की आज्ञा उसके लिए ईश्वर की आज्ञा थी जिसका पूरा करना शिवाजी ने अपना परम कर्तव्य समझा।

दादाजी के मरने के बाद शिवाजी ने अपने पिता की तरफ से


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