दी रखी थी कि कोई मरहठा बिना प्रमाणपत्र नगर के भीतर न आने पावे परन्तु शिवाजी ने अपनी चालाकी से प्रमाणपत्र प्राप्त कर किला और नगर में प्रवेश किया। शायस्ता खां की सेना के एक मरहठे सिपाही ने अपनी लड़की के विवाह के बहाने शहर में बाजे गाजे के साथ जुलूस निकालने की आज्ञा दी। इस बारात में कुछ शस्त्रधारी भी थे। शिवाजी जो ’संगरह’ के किले से शाम को रवाना हुए थे रात को 25 मावलियों और अफसरों के साथ चुपचाप उस जुलूस में ( जो बाजार में चक्कर लगा रहा था) आकर शामिल हो गये। जब सब लोग सो गये तो शिवाजी और उनके साथियों ने जो ’दादाजी’ के मकान की ईंट-ईंट से परिचित थे कुल्हाड़ियां लेकर ’रसोई घर’ के ऊपर चढ़ गये जहां से उन्होंने अन्दर घुसने का मार्ग बनाया परन्तु कुछ खटका होने से शायस्ता खां की स्त्रियां जग गई और कोलाहल मच गया। शायस्ता खां भी जाग पड़ा और एक खिड़की
जागीर का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया जब शिवाजी के पिता ने शेष मालगुजारी का हिसाब मांगा तो उसने उत्तर में लिख भेजा िकइस निर्धन इलाके की आमदनी इसके व्यय के ही लिए काफी होती है, बचने बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। सारी जागीर में केवल दो आदमी ऐसे थे जो शिवाजी से सहमत नहीं थे। इसलिए यह आवश्यक था कि वे या तो अपने पक्ष में हो जायें या एकदम पृथक हो जायें उन विपक्षियों में से एक का नाम फ़िरंगाजी नरसला था और दूसरे का नाम सम्भाजी मोहिते था। पहला ’चाकन’