के रास्ते निकल कर भाग जाने की कोशिश में था कि शिवाजी ने उसके हाथ पर वार किया। फलस्वरूप उसकी एक अंगुली कट गई। शायस्ता खां तो किसी प्रकार बचकर भाग निकला परन्तु उसका लड़का ’अब्दुल फतेह खां’ और बहुत से सिपाही मारे गये। जब वे तीन या चार कोस की दूरी पर पहुंचे तब उन्होंने मशालें जलाई मानो वे शाही सेना को, जो सामने खड़ी थी, दिखला रहे हैं कि हम कैसी प्रसन्नता से बिना किसी चिन्ता-भय के मशालों की रोशनी में आनन्द लेते हुए अपना काम करके वापस जा रहे हैं।
शिवाजी का यह काम उनके जीवन के बड़े कारनामों में मुख्य गिना जाता है, और क्यों न हो, जब कि सारी शाही सेना सामना करने के लिए सुसज्जित हो और शिवाजी 25 मनुष्यों के साथ शायस्ता खां के महल में जा घुसे और मार काट करके
72 छत्रपति शिवाजी
बिना किसी प्रकार की हाानि के मशालों की रोशनी में गरजते हुए अपने किले
नामक जिले का अध्यक्ष था और दूसरा शाहजी की दूसरी स्त्री शिवाजी की सौतेली मां का भाई था जो एक सूबेदार था। शिवाजी के दूतों ने फिरंगाजी को तो अपने पक्ष में कर लिया परन्तु सम्भाजी मोहिते रह गया। शिवाजी इसी चिन्ता ही में था कि ’गोन्दवाने’ का किला भी उसके हाथ आ गया। किले के रक्षक ने जो मुसलमान था, एक बड़ी भारी रकम रिश्वत में लेकर किला शिवाजी को सौंप दिया। यह किला और किलों से बड़ा और उचित स्थान पर था जिसका नाम शिवाजी ने ’ सिंहगढ़’ रक्खा और इसी नाम से वह अब तक प्रसिद्व है।