में वापस आये। यह एक ऐसी करतूत है जो फुरती से भरे हूए वीर के हिस्से में पड़ी है। प्रातःकाल होते ही मुगल सेना किले की ओर बढ़ी और जब बिल्कुल समीप पहुंच गई (जहां से कि तोपों के गोलों से भाग कर बचना सम्भव न था) तो उसने तोपें चलाना आरम्भ कर दीं। मरहठा सरदार,जो कि पहाड़ियों में छिपे हुए थे मुगल सेना पर टूट पड़े। अब मुगल सेना के पास भागने के सिवा कोई चारा न रहा। अब मुगल सेना के पास भागने के सिवा कोई चारा न रहा। आगे आगे मुगल सेना और पीछे पीछे मरहठा सरदारों की मार से मुगल सेना के बहुत से सिपाही मारे गये।
जब शायस्ता खां को इस पराजय का समाचार मिला तो उसका दिल टूट गया और निरूत्साही हो यशवन्तसिंह को झूठी शिकायतें करने लगा। पहले तो औरंगजेब ने इन दोनों को वापस बुला लिया और उनके स्थान में अपने पुत्र ’मुअज्जम’ को रवाना किया। परन्तु
सम्भाजी मोहिते के पास तीन सौ चुने हुए सवार थे और सूबे में उसका अधिकार था। शिवाजी के कई बार पत्र लिखने पर भी वह चिकनी चुपड़ी बातें करता रहा परन्तु शाह जी की आज्ञा के बिना उसने हिसाब चुकाने के लिए स्पष्ट इन्कार कर दिया। इस बात चिढ़ कर शिवाजी ने अपने मावली सिपाहियों को साथ लेकर रात के समय चढ़ाई कर दी और सम्भाजी मोहिते को उनके साथियों समेत कैद कर लिया।
छत्रपति शिवाजी 45
मेहिते को उन्होंने कर्नाटक भेज दिया और शेष आदमियों में से जिन्होंने नौकरी