फिर शायस्ता खां को बंगाल का शासन देकर यशवन्तसिंह को मरहठों के मुकाबिले के लिए भेजा परन्तु यशवन्तसिंह को भी पूरी सफलता न मिली कि वह शिवाजी को पहाड़ी किले से निकाल बाहर करता। अन्त में लाचार होकर अपनी सेना का कुछ भाग ’चाकन’ और ’जूनर’ के किलों पर छोड़ कर शाही सेना का औरंगाबाद वापस आना पड़ा।

शिवाजी ने विचार किया कि कुछ धन एकत्रित करना चाहिए क्यांेकि लगातार संग्रामों और दौरों से उसकी सेना को माल हाथ लगने का कोई भी अवसर नहीं मिला था। इसलिए अपने साथियों में यह प्रसिद्व कर दिया कि मैं नासिक के मन्दिर में दर्शन करने के लिए जा रहा हूं परन्तू चुपचाप 4000 सवार लेकर जनवरी सन् 1664 ई. में ’सूरत’ पर चढ़ाई कर दी। सूरत उन दिनों खूब दौलत से भरा था। छः दिनों तक शिवाजी ने बराबर शाही शहर को लूटा और बहुत सा माल लेकर अपने रायगढ़ के किले में, जो कि


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स्वीकार कर ली उन्हें अपने पास रख लिया और दूसरों को कर्नाटक अपने पिता के पास रवाना कर दिया। इस इलाके में कर्नाटक और पुरन्दर ही दो किले थे जो शाही अफसरों के अधिकार में थे। सदा से शिवाजी की उन पर दृष्टि लगी थी। उनमें से एक किला तो मुसलमान किलेदार को रिश्वत देकर ले लिया था और दूसरे किले की वह ताक में ही था। संयोग से इसी समय दूसरा किलेदार स्वर्गलोक चला गया।

मृत किलेदार के तीन पुत्र थे जिनमें से बड़ा बेटा बिना शाही आज्ञा प्राप्त किये ही अपने पिता की


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