बादशाहों को प्रसन्न रखना इनका कत्र्तव्य था और इस लेखन के बदले उन्हें भरपूर पारितोषिक मिलता था। इन इतिहासों में कदम कदम पर पक्षपात और आत्मप्रशंसा के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ग्रन्थों को लिखने के लिए बादशाहों के द्वारा लेखकों को मजबूर किया जाता था। इन ग्रन्थों में मुसलमानों की वीरता, हिम्मत

विज्ञप्ति 11

और विजय के वृत्तान्त को अतिश्योक्तिपूर्ण ढंग से लिखा जाता था। ये लोग जहां हिन्दुओं के विजय का समाचार लिखते तो उसका कारण चालाकी या चालबाजी बता देते थे। अनेक स्थानों पर हिन्दुओं को काफिर और कमजोर जैसे निन्दास्पद शब्दों से सम्बोधित किया गया है। यदि अंगे्रज जैसी सभ्य जाति के लोग भी अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों तक को न्यौछावर करने वालों को डाकू कहने में नहीं सकुचाते तो इन मुसलमान लेखकों को क्या दोष दें? देशप्रेमी लोगों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है। प्रथम अपनी जाति के अधीन नहीं हो सकती


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बहुत कुछ वैदिक धर्म पर आधारित हैं और इसकी प्रधान पुस्तक जे़ंदावस्ता में आर्य जाति के पुरातन सिद्वान्त ही प्रकारान्तर से लिपिबद्व किये गये हैं। ईसाइयत के पुराने नैतिक सिद्वांतों को भी प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में बीज रूप में देखा जा सकता है।

डा. हेयर के अनुसार इस्लाम धर्म के नेता ने सीरिया की एक धर्मसभा में धर्मचर्चा की थी। कतिपय ईसाइयों ने बौद्व धर्म और ईसाई मत में समानता तो स्वीकार की है किन्तू वे बौद्व धर्म की उत्पत्ति ईसाई मत से मानते हैं। इस धारणा में सत्य नहीं है। भारत


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