दुनिया उधर हो जाये परन्तु जब एक बार सामना करने की ठान लें तो प्रलय कर दें।

क्रोध से यदि भाल में रेखा हमारे आ पड़े।

शीश पर हो शीश तन पर तन व कर पर कर चढ़े।।

क्ुरते की बाहें यदि चढ़ें, आकाश भी हिल जायेगा।

बस उस तरह से ही तुरन्त तख़्ता ज़मीं थर्रायगा।।

जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत मुद्दतों के विकारों का अपने भीतर लीन करके पुनः एक दिन अकस्मात् फूट पड़ता है, और अपनी भभक से आगा पीछा नहीं देखता। इसी प्रकार दक्षिण भारत के वीरों में जो विकार दीर्घकाल से भरा हुआ था वह शिवाजी का रूप धर कर फूट निकला। इसका फल यह हुआ कि जो मार्ग में आया झुलस गया और चारों ओर जहां भी शिवाजी ने हथियार उठाया, अपना सिक्का जमा दिया। शिवाजी ऐसे भोले न थे कि वे इस प्रसन्नता में यह भूल जाते कि उनकी जााति का एक कट्टर शत्रु औरंगजेब अभी तक उनकी ताक


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नई नई सामग्रियां तैयार कराने लगे। एक ओर तो सेना इकट्ठी करके उसको सजाना प्रारम्भ किया, दूसरी तरफ अपने दूत समस्त इलाकों में भ्रमण करने के लिए भेज दिये, ताकि वे हिन्दू प्रजा में मुसलमानों के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न करें।

शिवाजी की इस स्वतन्त्र कार्यवाही पर यदि किसी को आश्चर्य हो तो वह शीध्र इस घटना से दूर हो गया होगा। जो इस बात का पूरा सबूत है कि शिवाजी अपने आप को किसी बादशाह के अधीन न समझता था। इसीलिए वह किसी से नहीं दबता था। जब उसको यह


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