को कई भागों में विभक्त कर शत्रुओं की भूमि का धावा कर दिया। यहां तक कि कई एक धनाढय व्यापारियों तथा नगरों को लूट कर अपने रायगढ़ किले में आ विराजे।
शिवाजी की इस कार्य-शैली के विषय में इतिहास लिखने वालों की कुछ भी सम्मति क्यों न हो परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इतनी कठिनता में भी जिस शीघ्रता और चालाकी से शिवाजी ने युद्व किया वह अपूर्व बुद्विमत्ता और वीरता की साक्षी देता है। इतिहास में इस प्रकार की होशियारी के दृष्टान्त बहुत कम देखे जाते हैं जिनके कारण एसे रात दिन नींद न आती थी। अन्त उसने (औरंगजेब) राजा जयसिंह राजपूत और ’दिलेरखां’ पठान को एक बड़ी फौज के साथ शिवाजी को आधीन करने के लिए भेजा। शिवाजी जब सामुद्रिक कार्यो से वापस आये तो देखते हैं कि अब मुकाबले की ठन गई औरंगजेब ने भी अपने बल की परीक्षा का पूरा इरादा कर लिया है। सम्पूर्ण मित्रों व अफसरों को रायगढ़
वहां से छूट कर सीधा दरबार में जा पहुंचा और वहां उसने शिवाजी की शक्ति का वृत्तान्त सबको सुनाया, जिसे सुन कर आदिलशाह को बड़ी चिन्ता हुई। उसके मन में यह सन्देह था कि यह सब कार्यवाही शाहजी की साजिश से हो रही है, और चूंकि कर्नाटक में शाहजी बड़े जोर पर थे, बादशाह ने अभी तक शिवाजी के साथ कोई कार्यवाही नहीं की। बादशाह ने उसे एक चिट्ठी लिख भेजी कि जिस तरह हो सके शाहजी को गिरफ्तार कर ले। बाजी घारपुरे ने शाहजी को निमन्त्रण देकर अपने घर पर बुलया और धोखे