के किले में एकत्रित करके विचार करने लगे। एक दिन शिवाजी को सन्देह हो गया कि श्रीमती भवाजीदेवी (जिसकी वह पूजा करते थे) स्वप्न में यह बतला रही है कि ऐ शिवाजी! तेरे लिए इस हिन्दू सेनापति के सम्मुख विजय प्राप्त होना कठिन है। तू निःसन्देह आज तक मुसलमानों के मुकाबले में विजय प्राप्त करता रहा परन्तु आज तो तेरा ही भाई एक राजपूत तेरे मुकाबले में आ डटा है। शिवाजी! तुमको क्या मालूम था कि मक्कार औरंगजेब ने उसको इसी विचार से भेजा है कि या तो

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वह स्वयं रण में मरेगा अथवा मेरा नाश करेगा। सीधा परन्तु वीर राजपूत (जयसिंह) अपनी वीरता का प्रत्यक्ष सबूत दिखाने के लिए हिन्दुओं को दबाने और उठते हुए राज्य का गला दबाने आया है। यद्यपि इस पिछले विचार से वह जाति का शत्रु और घातक है परन्तु इसके मारे जाने पर भी औरंगजेब की विजय है। इन निर्बल कर देने


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से कैद कर दरबार में भिजवा दिया। जब शाहजी को उसकी इन करतूतों से रोको नही ंतो तुम्हारी कुशलता नहीं। शाहजी ने शिवाजी के पास पत्र भेज कर बहुतेरा चाहा कि वह शान्त हो परन्तू शिवाजी ने पिता के पत्र का कोई उत्तर न दिया। उधर शाहजी ने बादशाह से बहुतेरा कहा कि शिवाजी से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। वह

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बादशाह का बागी है और मुझ से बग़ावत ठानता है। शाहजी की इन बातों पर बादशाह ने कुछ भी ध्यान न दिया और क्रोध में आकर आज्ञा दे दी कि शीध्र


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