वाले विचारों ने वीर मरहठा को, जिसकी नसों में राजपूती रक्त किसी कदर बदल चुका था, चिन्ता में डाल दिया। उसकी चिन्ता में डाल दिया और सम्पूर्ण सेना के मुख मण्डल को भी ढीला कर दिया और सम्पूर्ण सेना के मुख मण्डल में उदासीनता छा गई। अन्त में शिवाजी ने सोचा कि तलवार के बदले किसी अन्य ढंग से काम लेना चाहिए इसलिए शिवाजी ने सन्धि की चर्चा शुरू कर दी।
रायगढ़ के पास शिवाजी ने जयसिंह से सन्धि करने के लिए प्रस्ताव भेजा और उधर ’पूर्णधर’ किले में वीर मरहठे दिलेरखां और उसके वीर पठानों को जान लड़ाने की शिक्षा दे रहे हैं। उस मरहठा अफसर का नाम (जो किलेदार भी था) ’बाजी प्रभु’ था। उसके अधीन मरहठा सेना ने बड़ी उत्तमता से इस बात को सिद्व कर दिया कि रणभूमि से भाग कर प्राण रक्षा करने या संग्राम से घबड़ा भाग जाने या बिना किसी प्रकार का मुकाबला किये शस्त्र छोड़ देने अथवा किले को खाली कर देने की कलंक कालिमा अपने शिर पर लगाना सम्भव नहीं है।
ही शाहजी काो किसी अंधेरे गढ़े में कैद कर दिया जाय और वहां एक छोटा सूराख छोड़ कर कोई द्वार भी न खुला रहे। साथ ही यह भी धमकी दी कि यदि शिवाजी शीध्र ही अराजकता फैलाना बन्द न करेगा तो वह सूराख (छेद) भी बन्द कर दिया जायेगा और शाहजी को जिन्दा ही द़फन कर दिया जायेगा।
जब शिवाजी को पिता शाहजी के कैद होने का समाचार मिला तो बड़ी चिन्ता उपस्थित हुई। एक ओर तो पिता का जीवन संकट में और दूसरी और वर्षो की कड़ी मेहनत की कमाई कीर्ति और सम्पत्ति नष्ट होती थी