दिलेर खां किले की तरफ बढ़ा। उधर से ’बाजीप्रभु’ ने भी निर्भय हो कर उत्साह और गम्भीरता से युद्व करने की आज्ञा दे दी।
किले के बाहर जितने स्थान सुरक्षित थे बहुत सी मार काट के बाद भी हाथ से निकल गये। अन्त को दिलेर खां ने आज्ञा दी कि जिस पहाड़ी किले पर निचले किले का बुर्ज है उसको बारूद की सुरंग लगाकर उड़ा दिया जायें किले की सेना ने कई बार अत्यन्त उत्साह और वीरता के साथ सुरंग लगाने वालों को भगा दिया परन्तु अन्त में उन्हें
78 छत्रपति शिवाजी
एक ऐसा सहारा मिल गया जिससे कि वे गोली और बारूद की मार से बच कर अपना कार्य करने लगे, फिर भी उनको कई बार नाकामयाबी ही हुई। अन्त में उनके भाग्य ने पलटा खाया और किले का बुर्ज उड़ गया। हमला करने वाले लोग नीचे किले में आ गये और अन्दर किले की सेना ऊपर किले में जा रही थी उसने देखा कि शत्रुओं ने अपनी साधारण
और स्वतन्त्रता की आशा लता, जिसमें फल आने ही वाला था, सूखी जाती थी। शिवाजी इसी उधेड़ बुन में था कि बुद्विमती स्त्री ने समझााया कि क्षमा-प्रार्थना के अतिरिक्त स्वतन्त्रता से जो कार्यवाही की जायेगी वह शाहजी के लिए अधिक लाभदायक होगी। शिवाजी ने इस समय तक मुगलों के राज्य में हाथ नहीं डाला था इसलिए दूरदर्शिता से लाभ उठाने के लिए शाहजहंा से पत्र व्यवहार शुरू किया। जिसका फल यह हुआ कि शाहजहां ने आदिलशाह को शाहजी के अपराधों को क्षमा कर देने के लिए बाध्य किया और शिवाजी को पांच