दिया, परन्तु मरहठा सेना अपने अध्यक्षके मर जाने पर भी हताश नहीं हुई। सबों ने पक्का इरादा कर लिया कि जब तक शिवाजी की आज्ञा न आयेगी तब तक किला नहीं छोड़ेंगे और किले के ऊपर से ही जगत्-विध्वंसक आग बरसाने लगे यहां तक कि यह मार दिलेर खां की सेना न सहन कर सकी और किले को छोड़ कर पीछे हट गई। उत्साही दिलेर खां ने समझा कि मेरी दिलेरी कुछ काम न आ सकी। यद्यपि किलेदार मारा गया परन्तु तब भी किला अपने हाथ न आया। यह लोग मरहठा हैं या भूत हैं! किले के उत्तर की और से हताश होकर दक्षिण की ओर बढ़ा। दक्षिण दिशा में स्थित एक पहाड़ी पर ’वहीरगढ़’ नाम की एक छोटी सी गढ़ी थी, जहां से किले को हानि पहुंचाई जा सकती थी। उसी गढ़ी पर दिलेर खां ने अधिकार जमाया और गोला बरसाने की आज्ञा दे दी। इस अवसर पर ईश्वरीय सहायता भी किले की रक्षा के लिए आ पहुंची
अपने देश को स्वतन्त्र करने के लिए तैयार हो परन्तु जावली के राजा चन्द्रराव ने शिवाजी की कोई बात न सुनी बल्कि विरूद्व में उस पार्टी की पदद की जो शिवाजी को कैद करने के लिए जा रही थी। शिवाजी के मित्रों को इस अनुचित कार्यवाही पर बड़ा क्रोध आया और वे बदला लेने की फिक्र में घूमने लगे। इस काम में उन लोगों ने कुटनीति से काम लेना उचित ठहराया। राघोबल्लाल अत्रे और ’सम्भाजी कावजी’ मित्र भाव से इसके राज्य में जा घुसे और समय पाकर चन्द्रराव का वध कर दिया। बाहर से उसके