अर्थात् वर्षा आरम्भ हो गई और दिलेर खां की गोलाबारी अपना काम न कर सकी। कई सप्ताह यों ही बीत गये परन्तु किले की दीवारों को कुछ हानि न पहुंच सकी। उधर बाहर से अन्य कोई सहायता न मिलने के कारण सब का उत्साह न्यून होता जाता था। इतने में इन्हें समाचार मिला कि शिवाजी ने सन्धि की शर्ते ठहरा ली हैं अर्थात् जो किला दिलेर खां की दिलेरी से हाथ न आया था, जिसकी रक्षा के लिए हजारों मरहठों ने प्राणों की बाजी लगा रक्खी थी, जिसकी रक्षा में सुप्रसिद्व वीर शेर ’बाजी’ मारा गया था। उसी किले को शिवाजी ने एक स्वप्न मात्र से घबड़ाकर एक मिथ्या विश्वास से निर्बल होकर सहज ही शत्रु के हवाले कर दिया। यह सच है कि इसी प्रकार के
80 छत्रपति शिवाजी
मिथ्या विश्वासों का यह फल था कि एक वीर से वीर और जान से खेल जाने वाली एवम् आत्मा को नित्य मानने वाली भारत सन्तान इस्लामी झण्डे का मुकाबला न कर
साथियों ने चारों तरफ से ’जावली’ को घेर लिया। बड़ी भारी लड़ाई के बाद मन्त्री हिम्मतराव भी मारा गया। लड़के कैद कर लिये गये और ’जावली’ में राघो बल्लाल का अधिकार हो गया। समस्त मरहठा इतिहास लेखक एकमत होकर लिखते हैं कि राघोबल्लाल आदि ने यह काम शिवाजी को बिना सूचना दिये किया था इसलिए यह दग़ाबाजी शिवाजी के मत्थे नहीं मढ़ी जा सकती है। राजा चन्द्राराव का राज्य शिवाजी के हाथ आ जाने से उनकी शक्ति और ज्यादा बढ़ गई और उन्होंने ’खेरा’ पर भी अधिकार कर लिया। खेरा