सकी और थोडे़ ही समय में दासता की जंजीर पहिन अपने शुभ गौरव, विद्या बुद्वि एवं मान सत्कार को तिलाज्जलि दे बैठी। इन्हीं मिथ्या विश्वासों ने आर्यावर्त को कई बार पहले भी धोखा देकर नष्ट किया। इसी मिथ्या विश्वास ने इस समय शिवाजी की बुद्वि पर पत्थर डाल कर उनके उत्साह को धर दबाया और उनको ऐसी बातों पर विवश किया जिसने उनके गौरव और पुरूषार्थशील जीवन पर एक अमिट कलंक का टीका लगा दिया।

ऊपर लिखा जा चुका है कि शिवाजी ने राजा जयसिंह से सन्धि की शर्ते तय करने के लिए लिखा पढ़ी शुरू की थी। राजा जयसिंह ने शिवाजी के पास लिख भेजा था कि यदि शिवाजी को राजपूत के बेटे की बात पर विश्वास हो तो निर्भय होकर हमारे परस चला आवे। मैं उनको बादशाह से क्षमा करा दूंगा और इस बात की कोशिश करूंगा कि उन्हें शाही दरबार में आदर सम्मान और ऊंचा दर्जा मिलता रहे। जयसिंह की इस प्रतिज्ञा


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की लड़ाई में ’बन्दल देशमुख ने’ जो आक्रमण के समय किले में था, खूब वीरता से मुकाबला किया और उसके आदमियों ने तब तक अधीनता का नाम भी नहीं लिया था जब

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तक कि ’बन्दल’ लड़ता हुआ मारा न गया। अन्त में किला शिवाजी के हाथ आया और मुकाबला करने वालों में से देशमुख बाजी बड़े सम्मान से मिला। शिवाजी ने उसको उसके पिता के सम्पूर्ण अधिकार दे दिये और उसे अपनी अधीनता में रख लिया और एक पैदल सेना की बड़ी संख्या उसको दी गई जिसे पाकर उसने अपनी बाकी आयु बड़ी भक्ति के साथ शिवाजी की सेवा में व्यतीत की।


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