दिखाई कि औरंगजेब ने स्वयं चिट्ठी शिवाजी को लिखी जिसमें उसने शिवाजी की प्रशंसा की और एक बहुमूल्य दुशाला दिया। इसके बाद औरंगजेब ने फिर एक पत्र शिवाजी को लिखा कि मेरी यही इच्छा है कि शाही दरबार में बुलाकर आप का सत्कार किया जाये और फिर आप को आदर के साथ अपने राज्य में लौट जाने की आज्ञा दी जाये। राजा जयसिंह ने शिवाजी को विश्वास दिलाया कि वह स्वंय शिवाजी की स्वतन्त्रता का जिम्मेदार है। इस विश्वास पर शिवाजी ने दरबार में जाने का इरादा किया। इस अवसर पर शिवाजी ने अपने सभी किलों का निरिक्षण किया और किलों के अध्यक्षों तथा अन्यान्य अधिकारियों को आवश्यक आज्ञाएं देकर रवाना हुए।
अध्याय 8
दिल्ली दरबार और शिवाजी
राजा जयसिंह ने शिवाजी के साथ बड़े आदर सत्कार की प्रतिज्ञाएं की थी जिसके कारण शिवाजी अपने मन में यह विचार लेकर दिल्ली को चले थे कि औरंगजेब से दक्षिणी राज्य का पट्टा प्राप्त
हानि पहुंचाई थी। कुछ दिन तो यह राज्य एकत्रित होकर मुगल राज्य के सामने डटे रहे किन्तु उनके दुर्भाग्य से दूसरी बार औरंगजेब को सदैव इस बात का ध्यान रहता था कि इन दोनों रियासतों को हराकर मुगल राज्य के सूबे कायम कर दिये जायें। रियासतों को हराकर मुगल राज्य के सूबे कायम कर दिये जायें। इन दोनों राज्यों में हिन्दुओं का अधिक जोर था । हिन्दू पदाधिकारियों का बड़ा सम्मान होता था। गोलकुण्डा का बादशाह इस समय कुतुबशाह था और मीर जुमला जो हिन्दुस्तान में एक प्रसिद्व मनुष्य हुआ है,