करेंगे परन्तु जब दिल्ली के समीप आये तो अनका दिमाग घूम गया। यहां और ही रंग के खेल दृष्टिगोचर होने लगे। शानदार और सुसज्जित अगवानी के स्थान पर देखते क्या हैं कि केवल जयसिंह का पुत्र रामसिंह तथा एक और साधारण सा शाही पदाधिकारी आ रहा है। यह देख कर शिवाजी मन में बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे बड़ी भूल हुई और मैंने बड़ी भारी हार खाई। उन्हें सन्देह हो गया कहीं ऐसा न हो कि इसी भूल में प्राण भी चला जाये, अतएव मुझे सचेत हो जाना चाहिए। इस प्रकार ज्यों त्यों करके दिल्ली पहुंचे। उधर औरंगजेब ने विचारा कि बस अब क्या है अब तो शिवाजी मेरे काबू में आ गया। यही अवसर है कि दिल्ली का राजकीय गौरव इन्हें दिखाया जाय। उसने सोचा कि शिवाजी ने अपनी सारी आयु जंगलों में काटी है। लड़ाई झगड़े और लूट खसोट के सिवा इसने और कुछ नहीं देखा। आज तक मुग़ल सम्राट का विचार तक
उसका प्रधानमंत्री था। मीरजुमला के पुत्र मुहम्मद अमीन से कुछ अपराध हो गया था और बादशाह ने उसको दण्ड देने की ठानी थी। मीरजुमला को यह बुरा मालूम हुआ और उसने शाहजहां के पास इस बात की शिकायत की। औरंगजेब ने भी शाहजहां को खूब पट्टी पढ़ाई क्योंकि वह लड़ाई के लिए कोई बहाना ढूंढ़ रहा था। इसका फल यह हुआ कि शाहजहां ने क्रोध में आकर एक बड़ी चिट्ठी लिखी। कुतुबशाह को यह बात बड़ी बुरी लगी। उसने तुरन्त अमीन को कैद कर लिया और मीरजुमला की समस्त सम्पत्ति