इसके दिल में नहीं आया है। अपनी वीरता और चालाकी के भरोसे यह शाही सेना का मुकाबला करता आया है। इसने कभी यह अनुभव नहीं किया कि जिन राजकीय सेनाओं का मुकाबला वह बडे़ साहस से करता था उसकी पीठ पर एक ऐसा उच्च और महान् राज्य है जिसके सामने भारतवर्ष के सम्पूर्ण राजा महाराजा सिर झुकाते हैं।
अभिमानी राठौर, चैहान तथा कछवाहे भी बारी बारी से सब सिर झुका चुके हैं। राणा प्रतापसिंह के पदाधिकारी भी
छत्रपति शिवाजी 83
इस राज्य का लोहा मान चुके हैं। कन्नौज, दिल्ली, पाटलीपुत्र, मारवाड़ और मेवाड आदि सम्पूर्ण बड़े बडे़ राज्यों का गौरव आदर,सत्कार और धन मुग़ल सम्राट् के चरणों में पहुंच चुका है। जौरंगजेब चाहता था कि शिवाजी सब कुछ अपनी आंखों से देखे और मुग़लिया राज्य के गौरव तथा अपनी हीनावस्था का खूब अनुभव करे ताकि फिर उसे मेरा सामना करने का साहस न हो।
औरंगजेब
जब्प कर ली। बस फिर क्या था, औरंगजेब को मनमाना अवसर मिल गया और उसने तत्काल लड़ाई की ठान ली। औरंगजेब की लड़ाई में कुछ काम धोखेबाजी से लिया जाता था। इस अवसर पर भी उसने अपने बड़े बेटे मुहम्मद को बहुत सेना देकर गोलकुण्डा की तरफ रवाना किया किन्तु कुतुबशाह को यह सूचना दी कि ’शाहजादा’ शादी करने के लिए अपने चचा बंगाल के सूबेदार के पास जाता है। वह बेचारा इस बेइमानी को न समझ सका। कुतुबशाह को इन बातों का तभी पता लगा जब शाहजादा मुहम्मद