ऊपरी हृदय से तो साधुपन का दावा रखता था यहां तक कि बाप को गद्दी से उतार कर कैद करना और अन्त में विष देकर मरवा देना, भाइयों के साथ सख्ती करके बहुत बुरी तरह से मारना, हिन्दुओं के साथ दुष्टता का बर्ताव करना आदि सब धर्म की आड़ में किया करता था। माला दिन भर उसके हाथ में रहा करती। नमाज और रोज़ा रोजाना ठीक समय पर किया करता था। गाने बजाने को वह हराम समझता था, यहां तक कि उसके सामने गााना बजाना नितान्त बन्द था। शाहजहां की बनाई गद्दी पर बैठना उचित न समझता था। परन्तु यह एक विशेष अवसर था इस अवसर की विशेषता इसी से प्रकट है कि औरंगजेब ने भी उस साधुपने को थोड़ी देर के लिए तिलांजति दे दी।

बादशाह ने हिजरी सन् 1076 की तारीख ज़ीकाद तदनुसार 1666 ई. में एक बड़ा भारी दरबार किया गया। स्वयं सम्राट् बड़े बडे़ अमूल्य मोती तथा अप्राप्य


150 of 229

सुलतान उसके द्वार पर जा पहुंचा। विवश होकर कुतुबशाह ने अत्यन्त दीन भाव से सन्धि कर ली और एक करोड़ रूपया वार्षिक देना स्वीकार कर लिया। मीरजुमला दिल्ली दरबार में बुला लिया गया और इसे मन्त्री का पद दिया गया। इस बीच में मुहम्मद आदिलशाह ( बीजापुर का बादशाह) ता. 9 नवम्बर 1656 ई. को मर गया। दाराशिकोेह के द्वारा इस बादशाह का शाहजहां से परिचय हुआ था। इस कारण औरंगजेब इसको नुकसान पहुंचाना नहीं चाहता था। इसके मरते ही इसका बड़ा बेटा आदिलशाह तख़्त पर बैठ गया और इसने दिल्ली के बादशाह से किसी किस्म की बातचीत न की।


150 of 378