मणियों से बने हुए आभूषण धारण करके शाहजहां की गद्दी पर विराजमान हुआ मानो इस तिथि को ही सर्वप्रथम औरंगजेब पिता की गद्दी पर बैठा। अब तक तो औरंगजेब अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को आधीन कर चुका था, एक शिवाजी का ही अधिक खटका था से वह भी आज उसकी सेवा के लिए आ पहंुचा है। दरबारियों के लिए तीन दर्जे सुसज्जित किये गये थे जिनमें से पहले दर्जे में सुनहरी फर्श और दूसरे दर्जे में रूपहली और
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तीसरी दर्जे में संगमर्मर का फर्श था। जब शिवाजी दरबार में आये तो उसको सुनहरी फर्श के दर्जे में उन लोगों की श्रेणी में जो पांच हजारी पुरस्कार पाया करते थे, बैठने की आज्ञा दी गई। शिवाजी इस अनादर और अपमान को न सहन कर सके। राजपूती रक्त उनकी नसों में खौलने लगा। अपने से उच्च दरबारियों को सम्बोधन करते हुए बोले कि यदि उनमें मुझ से अधिक योग्यता है तो
जब मुगलों को यह बात मालूम हुई तो वे आपे से बाहर हो गये और उन्होंने यह बहाना बनाया कि अली आदिलशाह बादशाह बीजापुर का बेटा नहीं है और इस बहाने बीजापुर पर चढ़ाई कर दी। मीर जुमला और औरंगजेब इस लड़ाई में अफसर थे। बहुत सी लड़ाई और मुकाबले के पश्चात् बादशाह बीजापुर में न ठहर सका उसने क्षमा की प्रार्थना
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करनी शुरू की। जब औरंगजेब को शाहजहां के बीमार पड़ जाने की ख़बर मिली तो बीजापुर के बादशाह से सन्धि करके वह झट