रण में आयें और अपनी शक्ति का परिचय दें और मेरी वीरता देखें। बादशाह की आड़ लेकर डरपोक और स्त्रियों के समान आभूषण पहिन कर मुझ से उच्च दर्जे में बैठना अत्यन्त लज्जा की बात है।
शिवाजी की यह ललकार सुनते ही सम्पूर्ण दरबारी चकित हो गये कि यह मरहठा क्या अनर्थ कर रहा है? भारत के सम्राट् सामने बैठा है, चारों ओर मुसलमान पदाधिकारी अपने अपने स्थान पर बैठे हैं, सेना के लाखों मनुष्य मात्र नेत्र संचालन करने पर ही अपनी चमकीली औी तीक्ष्ण तलवारों को खनखनाने के लिए उद्यत हैं और यह महात्मा अकेला बिना किसी प्रकार के मित्र और सहायक के केवल चन्द साथियों के भरोसे पर इस प्रकार अण्ड बण्ड बक रहा है।
परन्तु सल्तनत मुग़लिया के भरे दरबार में इस प्रकार का साहस दिखाने का यह पहला मौका न था। अभी अधिक समय नहीं बीता था और कदाचित् उस घटना को अपनी आंखों देखने वाले
दिल्ली रवाना हो गया। इधर मुरादबख्श और शुजा भी आगरे की तरफ आ रहे थे। ’दारा शिकोह’ शाहजहां की आज्ञानुसार राजधानी का कार्य कर रहा था। औरंगजेब ने लौटते ही मुराद को दम दिलासा दिया कि मैं तो फकीर हूं। मुझे राज्याधिकार से कोई सम्बन्ध नहीं है दारा शिकोह और शुजा को बस में करके तुम्हें गद्दी पर बिठाऊंगा और मैं अलग होकर खुदा का भजन करूंगा, क्योंकि मुझे तो खुदा की भक्ति चाहिए। राज्य से मुझे क्या काम। अपने दुर्भाग्य से मुराद इस पट्टी में आ गया। मुराद और औरंगजेब की सेनाओं