कुछ दरबारी भी विद्यमान थे। वीर केशरी ’अमरसिंह राठौर’ ने शाहजहां के सामने भरे दरबार में सलावत खां का सिर उड़ा दिया था और बादशाह डर के मारे भाग कर स्वयं जनानख़ाने में प्राण बचाने के निमित्त जा घुसा था। वंश परम्परा से तो शिवाजी की नाड़ियों में भी पवित्र राजपूती रक्त दौरा कर रहा था। कहते हैं कि औरंगजेब ने यह तमाशा देखकर अनदेखा कर दिया, सिवाय मुस्कुराने के अन्य कोई बात मुंह से न निकाली और दरबार बर्खास्त हो गया। उस दिन से शिवाजी कभी दरबार में नहीं आये और औरंगजेब को
छत्रपति शिवाजी 85
सलाम किया। हां ! दूतों की मार्फत मेल मिलाप की बातें करते रहे। औरंगजेब दिल ही दिल में अपनी चालों पर खूब प्रसन्न हो रहा था। जिस समय शिवाजी अत्यन्त क्षुब्ध और क्रुद्व होकर दरबार में गरज रहे थे उस समय औरंगजेब ने यह विचार कर हंस दिया कि यह अब भी ’शेर की
ने मिलकर दाराशिकोह की फौज को भगा दिया। इस प्रकार एक एक करके औरंगजेब ने अपने भाइयों को पकड़ पकड़ कर धोखे से मरवा डाला। पिता शाहजहां को कैद करके स्वयं बादशाह बन बैठा। यह समस्त वृत्तान्त हिन्दुस्तान के इतिहासकार भली प्रकार जानते हैं। निदान 1657 ई. में औरंगजेब आगरा के सिहंासन पर विराजमान हो गया। शिवाजी भी औरंगजेब को खूब जानते थे। उन्होंने शिवाजी से सन्धि कर लेने की आज्ञा दे दी और कहा कि जो इलाके शिवाजी ने बीजापुर की रियासत से छीने हैं वह उन्हीं