कन्दरा में आकर गुर्राता है’ क्या उसे यह मालूम नहीं कि जीवन की घड़िया समाप्त हो गई हैं और अब वीरता दिखलाने का अवसर हाथ न आवेगा। शिवाजी जीवन से तो हाथ धो ही चुके थे अब तो केवल भाग्य की परीक्षा कर रहे थे कि शायद किसी प्रकार इस जाल से निकल जायें।
दूसरे दिन से औरंगजेब ने शिवाजी के निवास स्थान पर कड़े पहरे का प्रबन्ध करने का प्रबन्ध कर दिया। जब कभी शिवाजी शहर में घूमने जाते थे तो पहरेदार साथ रहते थे मानो वे एक प्रकार से नजरबन्द कैदी की हालत में थे।
एक अंगे्रज इतिहासकार ने लिखा है कि औरंगजेब ने शिवाजी को कत्ल करने का प्रबन्ध तो कर लिया, परन्तु कुंवर रामसिंह (जो राजा यशवन्तसिंह का पुत्र था) जब ख़बर मिली कि औरंगजेब ऐसी कुत्सित चालें चलने का विचार कर रहा है तो उसने सम्पूर्ण समाचार शिवाजी को जा सुनाया । जब यह समाचार शिवाजी को मालूम हुआ
के पास रहेंगे और साथ ही यह भी हुक्म दे दिया कि ’दावल’ और समुद्र किनारे के अन्य मुकाम भी शिवाजी ले लें। यों तो बीजापुर के राज्य को शक्तिहीन करने की यह चाल थी परन्तु वास्तव में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद करने की चेष्टा की थी। इस प्रकार अनेक युक्तियां की गई। बीसों तरकीबें निकाली गई परन्तु शिवाजी औरंगजेब के हाथ न आयें, अलग ही रहे। इससे स्पष्ट ज्ञात हो गया कि शिवाजी अब औरंगजेब से दो दो हाथ करने को तैयार हैं।
54 छत्रपति शिवाजी
शिवाजी ने सन् 1657 ई.