तो वे निकलने का उपाय करने लगे और बीमारी का बहाना करके इलाज करवाना आरम्भ कर दिया। थोड़े दिनों के बाद यह बात प्रसिद्व कर दी कि अब बीमारी दूर हो गई है जिस की खुशी में अमीरों और उमरावों तथा बड़े बड़े पदाधिकारियों के यहां मिठाइयों के टोकरे भेजने शुरू कर दिये ऐसी टोकारियों में जिनमें मनुष्य बड़े आराम से छिप कर बैठ सकता था मिठाई भर भर कर मन्दिरों और मस्जिदों को भेजी जाने लगीं।
एक दिन अपने एक साथी को जो सूरत शक्ल और मुखडे़ की बनावट में शिवाजी से बहुत कुछ मिलता जुलता था अपनी सोने की अंगूठी पहना कर अपनी चारपाई पर लिटा
86 छत्रपति शिवाजी
दिया और आप एक टोकरे में (जो मिठाई से भरी थी) बैठे और दूसरी में अपने पुत्र सम्भाजी को (जो संग ही था) बिठाकर शहर से बाहर निकल गये। दिल्ली से बाहर घोड़े पर सवार हो दूसरे दिन मथुरा पहुंचे। यहां
के मई महीने में रात के समय ’’जुनार’’ शहर (जो मुगलों के इलाके में था) को घेर लिया और खूब लूटा। यहां से उनको तीन लाख ’गोपड़ा करन’ घोड़े, बहुत से अपूल्य वस्त्र और अन्यान्य वस्तुएं प्राप्त हुई जिन्हें शिवाजी ने तुरन्त पूना और रामगढ़ भिजवा दिया। शिवाजी स्वयं ऐसे मार्ग से, जिन पर बहुत आदमी नहीं चलते थे, चल कर अहमदनगर पहंुचा और उसे लूटना शुरू कर दिया। इन्होंने बहुत घोड़े खरीदे और सवारों को नौकर रखा। मानकजी को, जो उनके पिता का विश्वासपात्र नौकर था