पर इनका एक विश्वासपात्र मित्र नेताजी और कई एक ब्राह्यण शिवाजी की राह देख रहे थे। मथुरा पहुंच कर शिवाजी ने दाढ़ी मूंछ मुंड़ा दी और शरीर पर विभूति रमा एक साधु का भेष बना लिया। रूपया पैसा और हीरा मोती, ये सब एक खोखली छड़ी में रखकर रातों रात प्रयाग पहुंचे । प्रयाग में उन्होंने अपने बेटे सम्भाजी को जो उस समय बालक था एक दक्षिणी ब्राह्यण को सौंप दिया और कठिन चेतावनी दे दी कि जब तक मेरे हाथ की लिखी चिट्ठी न आवे तुम इसको मत भेजना। इस प्रकार अपना बोझ हलका करके शिवाजी उसी साधु के वेश में काशी की ओर चल दिये। जिस समय शिवाजी प्रयाग से रवाना हुए उस समय प्रयाग से एक गोल (झुण्ड) वैरागियों गुसाइयों और साधुओं का काशी जा रहा था। इन्हीं के साथ शिवाजी भी चल पड़े। रात में यह झुण्ड बढ़ता जा रहा था कि एक स्थान पर एक मुसलमान सेना अध्यक्ष ने उन्हें पकड़ लिया
फौज का अफसर बना दिया और एक अन्य लोकप्रिय मरहठा शिरोमणि नेताजी पालकर को भी अपने साथ ले लिया। शिवाजी उस महती शक्ति के विरूद्व भाग्य की परीक्षा करने लगे जो 100 वर्ष पूर्व से भारत की अधिपति बनी चली आती थी, जिसकी गद्दी पर आज औरंगजेब जैसा नृशंस और कपटी मनुष्य विराजमान था। यद्यपि शिवाजी राज-प्रबन्ध करने लगे थे परन्तू मन में निश्चय कर लिया कि जब तक सामना करने की पूर्ण सामग्री न हो जाये तब तक सामना न करना ही ठीक होगा और तब तक चापलूसी की बातों से ही औरंगजेब को भुलावा देते रहे।