और तलाशी की आज्ञा दी। एक दिन और एक रात शिवाजी की जान बड़े संकट में पड़ी रही। शिवाजी को यह चिन्ता हुई कि ईश्वर न करे, यह सम्पूर्ण परिश्रम बेकार ही जाय और दिल्ली के बजाय काशी में एक दुष्ट मुसलमान के हाथ मारा जाऊं। दिल में विचारा कि ऐसा काम करना चाहिए जिससे या तो इधर या उधर। यदि पहरेदार कुछ लालच में जा जाये तो काम बन जाये। यह विचार कुछ लालच में जा जाये तो काम बन जाये। यह विचार कर तुरन्त फौजदार के सामने जा खड़े हुए और चुपके से कहा कि मैं शिवाजी हूं एक ओर मैं हूं और दूसरी और बहुमूल्य ये दो हीरे हैं। यदि हीरे लेने की इच्छा है तो मुझे छोड़ दो अन्यथा मैं तो तैयार ही हूं, जो चाहे सो कर, जीता पकड़ ले या सिर काट ले और औरंगजेब के पास भेज दे परन्तु यह ख्याल रहे कि इस अवस्था में हीरे तेरे
छत्रपति शिवाजी 87
हाथ न लगेंगे। शिवाजी ने
ऊपर लिखा जा चुका है कि जब शाहजी दरबार बीजापुर में कैद किये गये थे तो शिवाजी ने शाहजहां से अपील की थी और शाहजहां ने उनको पांच हजारी का पारितोषिक दिया था। परन्तू शिवाजी ने उसे स्वीकार करने के स्थान पर कुछ प्रान्तों के विषय में अपनी देखमुखी और चैथ के अधिकार पेश किये थे। अन्त में शाहजहां ने यह प्रतिज्ञा की थी कि जब शिवाजी पांच हजारी पुरस्कार को स्वीकार करके दरबार में आ जायेंगे तो और अधिकारों पर भी विचार किया जायेगा। शिवाजी ने अब फिर इस विषय में औरंगजेब