सोचा कि यदि यहां एक रात और रहा तो प्रातःकाल तक शाही सेना अपने कर्मचारियों के साथ पहुंच जायेगी और फिर जान से हाथ धोना पडे़गा। यदि यह चाल चल गई तो अच्छा, वरना मरना तो है ही। शिवाजी ने अपनी जान हथेली पर रख कर जो चाल चली वह पूरी उतर गई। मुसलमान फौजदार ने लालच में आकर हीरे ले लिये और शिवाजी को छोड़ दिया। बस फिर क्या था शिवाजी अत्यन्त फुर्ती के साथ रात कूच करते हुए काशी आ पहुंचे और फिर काशी से बिहार पटना और चांदा के रास्ते दक्षिण आ पहुंचे।
उधर दिल्ली का वृत्तान्त सुनिये। एक गुप्तचर ने औरंगजेब को खबर दी कि शिवाजी भाग गया। सम्राट् ने कोतवाल से उत्तर मांगा, कोतवाल ने लिखा कि उसके चारों ओर पहरा बैठा है और शिवाजी मौजूद है। सम्राट् को शान्ति हो गई परन्तु फिर एक गुप्तचर ने खबर दी कि शिवाजी भाग गया। सम्राट् ने फिर जवाब मांगा, अतः कोतवाल
के साथ बातचीत की और बीजापुर के बादशाह आदिलशाह के कुप्रबन्ध की नींव पर ’कोंकण’ प्रान्त पर स्वत्व
छत्रपति शिवाजी 55
ज्माने की आज्ञा चाही तथा अपने पुराने अनुचर को पेश किया और बारी बारी से ’रघुनाथ’ और ’कृष्णजी भास्कर’ नामक वकीलों को मुगल दरबार में भेजा।
औरंगजेब इस समय राजपुतों से लड़ रहा था। उसने भी अपना अहोभाग्य समझा कि शिवाजी की तरफ से चिन्ता दूर हो। इसके सिवाय उसने यह सोचा कि यदि शिवाजी और आदिलशाह परस्पर लड़ते रहेंगे तो दोनों में से