स्वयं शिवाजी के स्थान पर आया और शिवाजी के पलंग पर उस मनुष्य को सोता पाया जो शिवाजी की अगूंठी पहिने हुए था। उसने फिर सम्राट् को वही उत्तर दिया। परन्तु तीसरे गुप्तचर ने शिवाजी के भागने की खबर फिर औरंगजेब को दी कहा कि कोतवाल की रिपोर्ट झुठी है। इस तीसरी खबर पर खूब अच्छी तरह से जांच की गई तो भेद खुल गयाथ् तत्काल सब सूबेदारों, हाकिमों, सेनापतियों तथा फौजदारों के नाम आज्ञा पत्र भेजे गये कि शिवाजी जहां भी मिले तुरन्त पकड़ कर दरबार में उपस्थित किया जाये। अत्यन्त शीघ्रता से दूत चारों तरफ भेजे गये परन्तु पिंजड़े से निकला हुआ शेर फिर हाथ न आया और औरंगजेब हाथ मलता रह गया।
शिवाजी तो किसी प्रकार अपनी जान बचाकर निकल भागे परन्तु बेचारे रामसिंह पर शाही आपत्ति आ पड़ी। रामसिंह को अपनी प्रतिज्ञा पूर्ति का दण्ड भुगतना पड़ा। उधर शिवाजी के पिता का बीजापुर की लड़ाई से लौटते समय
कोई भी मुगल साम्राज्य पर धावा न कर सकेंगे और परस्पर एक दूसरे की शक्ति क्षीण कर देंगे। फलस्वरूप शिवाजी को, कोंकण प्रान्त पर अधिकार जमाने की आज्ञा औरंगजेब ने दे दी। उसके वास्तविक अधिकारों के विषय में बाजी ’सोनदेव’ को दरबार में भेजना निश्चय हुआ िकवह दरबार में जाकर इस बात की चर्चा चलावें। शिवाजी को इसने आज्ञा भेजी तथा शेष सेना से राजमण्डल का प्रबन्ध करे। शिवाजी तथा औरंगजेब एक दूसरे को खूब जानते थे किन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि वह पत्र-व्यवहार यहां तक रहा