इतिहास लेखक लिखता है कि 1871 में पुर्तगालवासियों ने मुसलमानी सेना को शराब को शराब पीलाकर मतवाला बना दिया। ग्रान्ट डफ ठन बातों को झूठा मानते हैं और लिखते हैं कि मुसलमानों को जब हार का सामना करना पड़ा तो उसके मूल में दगाबाज़ी और विश्वासघात ही था। फरिश्ता की विश्विसनीयता कितनी है इसके लिए इस योग्य अंगे्रज लेखक का यह कथन ही काफी है।

ख़ाफी खां एक अन्य लेखक है जिसके लिखे इतिहास से पर्याप्त सहायता ली जा सकती है। उसने जहां भी हिन्दू वीरों की कथा कही उन्हें घृणास्पद शब्दों से सम्बोधित किया। क्या ऐसे इतिहास ग्रन्थों से हम अपने बच्चों को वास्तविकता से परिचित करा सकते है? सच तो यह है कि आजकल जो इतिहास पढ़ाया जाता है वह किसी स्वतन्त्र अनुसंधान के आधार पर नहीं लिखा गया। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू स्वयम् अपने अनुसंधान के आधार पर अपना इतिहास लिखें और उन पुस्तकों से भी सहायता लें जो सच्चाई को प्रस्तुत करती हैं।


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जाति का इतिहास तथा उसके उपकरण विद्यमान हैं और यदि कोई शोधकर्ता संस्कृत के ग्रन्थों के आधार पर इतिहास के तथ्यों का अन्वेषण करे तो बहुत कुछ जानकारी मिल सकती है।

आर्य जाति की पुरातनकालीन उन्नति के ज्ञान के लिए हमें संस्कृत विद्या का अध्ययन करना होगा। किन्तू प्रश्न होता है कि जब तक संस्कृत ग्रन्थों की सहायता लेकर भारत का इतिहास लिखा जाये तब तक हमें क्या करना है? यह प्रश्न हमें चिन्ताग्रस्त कर देता है। सच्चाई यह है कि आज इस देश के हिन्दू बालकों को जो इतिहास पढ़ाया


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