बहुत क्रोधित हुआ। दिलेर खां और शुजाअत खां को एक बहुत बड़ा सेना देकर शिवाजी को दण्ड देने के लिए भेजा।
यहां यह बात याद रखनी चाहिए कि औरंगजेब ने कभी किसी का विश्वास नहीं किया। अकबर ने तो हिन्दू राजाओं को उनकी चापलूसी, विश्वास और एहसान से अपना सेवक बनाया था और उन्हीं की सहायता से सारे भारतवर्ष पर विजय प्राप्त करके मुग़ल राज्य को पक्का किया था।
ज्हांगीर और शाहजहां ने भी न्यूनाधिक रूप से अकबर की ही नीति से काम किया था और हिन्दुओं से सम्बन्ध स्थिर रक्खे थे। यद्यपि शाहजहां के समय में इन सम्बन्धों का रूख बदल गया था परन्तु औरंगजेब ने तो बिल्कुल रंग ही पलट दिया। औरंगजेब हिन्दू राजाओं को अत्यन्त घृणा की दृष्टि से देखता था परन्तु साथ ही इस बात का भी यत्न करता था कि वे खुले रूप से इसके शत्रु न बन जायें। औरंगजेब हिन्दू राजाओं को प्रायः ऐसे स्थानों में भेजा करता था जहां से उनके जीते जी आने की आशा नहीं रहती थी। इसके सिवा एक और अविश्वास
यद्यपि वह स्वयं उस पराजय का उत्तरदाता न था। अतएव शामरावजी़ पन्त को पीछे बुला लिया गया और नायक पद से पृथक् कर दिया गया और उसके स्थान पर ’रघुनाथ पन्त’ यद्यपि स्वयं रणभूमि से पीछे नहीं हटा परन्तु अपने विरोधी की भी नहीं हटा सका। अन्त को वर्षा ऋतु के आरम्भ होने से दोनों सेनाएं संग्राम-भूमि से पीछे हट गई। इस समय एक और बलवान् शत्रु शिवाजी के सामने आया।
अध्याय 5
अफजल खां की घटना
बीजापुर के शासक ने इस समय अनुमान लगाया कि शिवाजी को